जानिए क्यों हीलियम की कमी दुनिया के लिए एक बड़ा संकट बन सकती है ?

अमेरिका और कतर दुनिया में हीलियम उत्पादन के 'बादशाह' हैं, जो मिलकर वैश्विक आपूर्ति का लगभग 75-80% हिस्सा नियंत्रित करते हैं।

जानिए क्यों हीलियम की कमी दुनिया के लिए एक बड़ा संकट बन सकती है ?

हीलियम: ब्रह्मांड का 'हल्का' तत्व, आधुनिक दुनिया का 'भारी' आधार

हीलियम गैस को अक्सर हम सिर्फ गुब्बारों में भरने वाली गैस के रूप में देखते हैं, लेकिन वास्तव में यह आधुनिक विज्ञान और तकनीक की रीढ़ है। ब्रह्मांड में हाइड्रोजन के बाद यह दूसरा सबसे प्रचुर तत्व है, लेकिन विडंबना यह है कि पृथ्वी पर इसकी उपलब्धता बहुत ही सीमित है। यही कारण है कि इसे 'क्रिटिकल रिसोर्स' माना जाता है।

हीलियम का 'बादशाह': किसका है दबदबा?

दुनिया में हीलियम के उत्पादन और निर्यात के मामले में संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) निर्विवाद रूप से 'बादशाह' बना हुआ है। अमेरिका के पास टेक्सास में 'फेडरल हीलियम रिजर्व' जैसा विशाल भंडार है, जो दशकों से वैश्विक आपूर्ति को नियंत्रित करता आया है। वर्तमान में, दुनिया के कुल हीलियम उत्पादन का लगभग 40% से अधिक हिस्सा अकेले अमेरिका से आता है।

हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में कतर (Qatar) एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरा है। कतर अपनी प्राकृतिक गैस (LNG) परियोजनाओं के साथ हीलियम का भी बड़े पैमाने पर उत्पादन कर रहा है और अब वह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। वैश्विक बाजार में लगभग 30-35% हिस्सेदारी के साथ कतर, अमेरिका को कड़ी चुनौती दे रहा है। इनके अलावा रूस और अल्जीरिया भी प्रमुख उत्पादकों की श्रेणी में आते हैं, लेकिन वे अभी अमेरिका और कतर से काफी पीछे हैं।


भारत की स्थिति: पूरी तरह 'निर्भर'

जब बात भारत की आती है, तो स्थिति थोड़ी चिंताजनक है। भारत अपनी हीलियम संबंधी जरूरतों के लिए लगभग 100% आयात पर निर्भर है। भारत मुख्य रूप से कतर और अमेरिका से हीलियम मंगवाता है।

भारत में हीलियम का व्यावसायिक उत्पादन (Commercial Production) शून्य के करीब है। हालांकि, भारत के पास प्राकृतिक गैस के कुछ ऐसे भंडार हैं (जैसे राजस्थान के जैसलमेर और पश्चिम बंगाल के कुछ क्षेत्र) जहाँ हीलियम के अंश पाए गए हैं। ओएनजीसी (ONGC) और परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) लगातार इस कोशिश में हैं कि स्वदेशी तकनीक विकसित कर प्राकृतिक गैस से हीलियम को अलग किया जा सके। लेकिन, इस गैस को अलग करने के लिए आवश्यक 'क्रायोजेनिक पृथक्करण' तकनीक काफी जटिल और महंगी है, जिस पर अभी काम चल रहा है।


हीलियम क्यों है इतना कीमती?

हीलियम की खासियत यह है कि यह किसी भी अन्य तत्व की तुलना में सबसे कम तापमान पर तरल (Liquid) बना रह सकता है। इसका क्वथनांक (Boiling point) लगभग -269°C है। इसी गुण के कारण यह निम्नलिखित क्षेत्रों में अनिवार्य है:

  • चिकित्सा क्षेत्र (MRI): अस्पतालों में लगी MRI मशीनों के शक्तिशाली चुंबकों को ठंडा रखने के लिए लिक्विड हीलियम का उपयोग होता है। इसके बिना MRI करना असंभव है।

  • अंतरिक्ष अनुसंधान: इसरो (ISRO) अपने रॉकेट इंजनों में ईंधन को प्रेशराइज करने और प्रणालियों को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में हीलियम का उपयोग करता है।

  • सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स: आपके स्मार्टफोन, लैपटॉप और कारों में लगने वाली चिप (Semiconductors) के निर्माण में हीलियम एक सुरक्षात्मक वातावरण और शीतलक का काम करती है।

  • रक्षा और वैज्ञानिक शोध: सुपरकंडक्टिविटी और एडवांस्ड वेल्डिंग तकनीकों में इसकी अहम भूमिका है।


भविष्य की राह

हीलियम एक गैर-नवीकरणीय संसाधन है। एक बार यह हवा में मुक्त हो जाए, तो यह सीधे अंतरिक्ष में निकल जाती है और इसे दोबारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। वैश्विक बाजार में इसकी बढ़ती कीमतों और आपूर्ति की अनिश्चितता को देखते हुए, भारत अब हीलियम के पुनर्चक्रण (Recycling) और घरेलू स्रोतों की खोज पर जोर दे रहा है। आने वाले समय में आत्मनिर्भरता ही भारत के तकनीकी और वैज्ञानिक मिशनों की सफलता की कुंजी होगी।