सोमनाथ: 17 बार टूटा, हर बार फिर खड़ा हुआ !

सोमनाथ मंदिर का इतिहास विदेशी आक्रांताओं के हमलों और हिंदुओं के बलिदान की एक अमर गाथा है। आजादी के बाद सरदार पटेल के दृढ़ संकल्प से इसका पुनर्निर्माण हुआ।

सोमनाथ: 17 बार टूटा, हर बार फिर खड़ा हुआ !

सोमनाथ मंदिर का इतिहास: अटूट आस्था और पुनरुत्थान की गाथा

गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता और 'विनाश पर विकास की विजय' का जीवंत प्रतीक है। ऋग्वेद में भी वर्णित इस प्रथम ज्योतिर्लिंग का इतिहास जितना वैभवशाली रहा है, उतना ही रक्तरंजित भी।


1. वैभव और आक्रांताओं के बर्बर हमले

सोमनाथ मंदिर अपनी अपार संपत्ति और आध्यात्मिक महत्व के कारण विदेशी आक्रांताओं के निशाने पर रहा।

  • महमुद गजनवी (1024 ई.): सबसे विनाशकारी हमला गजनवी ने किया। इतिहासकार बताते हैं कि मंदिर की रक्षा करते हुए 50,000 से अधिक शिवभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। गजनवी ने न केवल मंदिर लूटा, बल्कि शिवलिंग को भी खंडित कर दिया था।

  • अलाउद्दीन खिलजी और औरंगजेब: 13वीं और 17वीं शताब्दी में भी खिलजी और औरंगजेब जैसे शासकों ने मंदिर को ढहाने और लूटने के कई प्रयास किए। हर बार मंदिर को तोड़ा गया, लेकिन हिंदुओं की आस्था इसे बार-बार पुनर्जीवित करती रही।


2. आधुनिक पुनर्निर्माण और सरदार पटेल का संकल्प

स्वतंत्रता के बाद, सोमनाथ के पुनरुत्थान का बीड़ा देश के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने उठाया।

  • जूनागढ़ विलय के बाद: नवंबर 1947 में जब जूनागढ़ भारत का हिस्सा बना, तब सरदार पटेल ने समुद्र तट पर खड़े होकर मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया।

  • गांधी जी की सलाह: महात्मा गांधी ने इस पहल का स्वागत किया, लेकिन सुझाव दिया कि मंदिर के निर्माण का खर्च सरकार के बजाय जनता के चंदे (Public Contribution) से जुटाया जाना चाहिए।


3. नेहरू की आपत्ति और वैचारिक मतभेद

मंदिर के पुनर्निर्माण और इसके उद्घाटन को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल/के.एम. मुंशी के बीच वैचारिक मतभेद थे।

  • सरकारी संरक्षण का विरोध: नेहरू का मानना था कि एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) देश की सरकार को धार्मिक स्थलों के पुनर्निर्माण में सक्रिय रूप से शामिल नहीं होना चाहिए। उन्होंने इसे "हिंदू पुनरुत्थानवाद" (Hindu Revivalism) की संज्ञा दी थी।

  • राजेंद्र प्रसाद को पत्र: जब मंदिर का काम पूरा हुआ, तो नेहरू ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को उद्घाटन समारोह में न जाने की सलाह दी थी। हालांकि, राष्ट्रपति प्रसाद ने इसे ठुकरा दिया और कहा कि "मैं सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान करता हूं, और सोमनाथ हमारी राष्ट्रीय विरासत का हिस्सा है।"


4. 'अमृत महोत्सव' और आज का सोमनाथ

11 मई 1951 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा की थी। आज, इस ऐतिहासिक घटना के 75 वर्ष पूरे होने पर 'सोमनाथ अमृत महोत्सव' मनाया जा रहा है।

  • अहिल्याबाई होलकर का योगदान: जब मंदिर खंडहर था, तब इंदौर की रानी अहिल्याबाई होलकर ने मुख्य मंदिर के पास ही एक छोटा मंदिर बनवाया था ताकि पूजा जारी रहे।

  • वर्तमान स्वरूप: आज का भव्य मंदिर चालुक्य शैली (कैलाश महामेरु प्रासाद) में बना है, जो अपनी वास्तुकला के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।


सोमनाथ का इतिहास हमें सिखाता है कि समय कितना भी क्रूर क्यों न हो, सत्य और आस्था को कभी मिटाया नहीं जा सकता। "सोमनाथ फिर से मुस्कुरा रहा है" - यह वाक्य भारत के सांस्कृतिक गौरव की वापसी का प्रतीक है।