एक पर्व, अनेक रंग: अयोध्या से कोलकाता तक दिवाली की अद्भुत परंपराएं !

जानिए भारत के अलग-अलग राज्यों में दिवाली कैसे मनाई जाती है। अयोध्या का भव्य दीपोत्सव, वाराणसी की देव दीपावली और कोलकाता की काली पूजा की अनूठी परंपराएं पढ़ें।

एक पर्व, अनेक रंग: अयोध्या से कोलकाता तक दिवाली की अद्भुत परंपराएं !

देश के अलग-अलग राज्यों में कैसे मनाते हैं दिवाली? 

भारत की सांस्कृतिक पहचान उसकी विविधता में रची-बसी है। जब दीपों के महापर्व दीपावली की बात आती है, तो यह विविधता और भी खूबसूरत रूप में उभरती है। उत्तर भारत के गंगा-सरयू घाटों से लेकर पूर्वी भारत के पंडालों और दक्षिण के आंगन तक, दिवाली मनाने की शैली और मान्यताएं भले अलग हों, लेकिन मूल संदेश एक ही रहता है—अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की विजय।

आइए जानते हैं कि देश के प्रमुख सांस्कृतिक केंद्रों—अयोध्या, वाराणसी और कोलकाता—के साथ-साथ विभिन्न राज्यों में दिवाली का पर्व किस अनोखे अंदाज में मनाया जाता है।

1. अयोध्या: प्रभु श्री राम की अगवानी और 'दीपोत्सव' की दिव्यता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्री राम जब 14 वर्ष के वनवास और लंका विजय के बाद सीता जी और लक्ष्मण जी सहित अयोध्या लौटे थे, तब नगरवासियों ने दीपमालाएं सजाकर उनका स्वागत किया था। यही दिन आज देश भर में दीपावली के रूप में जाना जाता है।

  • सरयू तट पर लाखों दीयों का संगम: अयोध्या में दिवाली का उत्सव आज विश्व पटल पर छा चुका है। 'राम की पैड़ी' और सरयू के विभिन्न घाटों पर एक साथ लाखों मिट्टी के दीये प्रज्वलित किए जाते हैं।

  • सांस्कृतिक वैभव: दीपोत्सव के अवसर पर रामायण प्रसंगों पर आधारित सजीव झांकियां, लेजर शो और पारंपरिक लोक नृत्य इस पर्व को त्रेतायुग की स्मृति से जोड़ देते हैं।

2. वाराणसी: मुख्य दिवाली से 'देव दीपावली' तक अलौकिक दृश्य

काशी में दिवाली का पर्व केवल कार्तिक अमावस्या तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह ठीक 15 दिन बाद आने वाली कार्तिक पूर्णिमा यानी देव दीपावली पर अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचता है।

  • देवताओं का आगमन: धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव द्वारा त्रिपुरासुर दैत्य के संहार के उपरांत देवी-देवता स्वर्ग लोक से उतरकर काशी के गंगा तट पर दीपदान और उत्सव मनाते हैं।

  • 84 घाटों पर दीपों की कतार: अस्सी घाट से लेकर नमो घाट तक, गंगा के अर्धचंद्राकार किनारों पर सीढ़ियों को लाखों दीयों से सजाया जाता है। नदी की शांत लहरों पर तैरते दीप और दशाश्वमेध घाट की भव्य महाआरती काशी को एक स्वर्णिम आभा में समेट लेती है।

3. कोलकाता और पश्चिम बंगाल: श्यामा पूजा और 14 दीपों का विधान

उत्तर और पश्चिम भारत में जहाँ दिवाली की रात माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की आराधना की जाती है, वहीं पश्चिम बंगाल में यह रात शक्ति स्वरूपा माँ काली की उपासना को समर्पित होती है।

  • काली पूजा (श्यामा पूजा): कार्तिक अमावस्या की मध्यरात्रि में माँ काली की विशेष तांत्रिक व वैदिक पूजा की जाती है। कालीघाट और दक्षिणेश्वर मंदिर सहित पूरे शहर में भव्य पूजा पंडाल सजाए जाते हैं।

  • भूत चतुर्दशी और 14 शाक: दिवाली से एक दिन पहले यहाँ 'भूत चतुर्दशी' मनाई जाती है। इस दिन घर के 14 अलग-अलग कोनों में 14 मिट्टी के दीये (चौद्द प्रदीम) जलाए जाते हैं और 14 तरह की मौसमी हरी पत्तियां (चौद्द शाक) पकाने की परंपरा है, जिससे पितरों का आशीष प्राप्त होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है।

देश के अन्य राज्यों में दिवाली की अनोखी शैलियां

राज्य / क्षेत्र पर्व का स्वरूप मुख्य रीति-रिवाज व परंपरा
तमिलनाडु व केरल नरक चतुर्दशी भोर में सूर्योदय से पूर्व तिल के तेल से औषधीय 'गंगा स्नानम्', नए वस्त्र धारण करना और पाचन हेतु 'दीपावली लेहियम' औषधि का सेवन।
गोवा नरकासुर दहन नरक चतुर्दशी की अलसुबह भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर वध की स्मृति में विशालकाय पुतलों का दहन और उत्सव।
महाराष्ट्र वासुबारस व अभ्यंग स्नान गोवत्स द्वादशी (गाय-बछड़े की पूजा) से पर्व का आरंभ; उबटन युक्त अभ्यंग स्नान और चकली, करंजी जैसे 'फराल' पकवानों का आदान-प्रदान।
गुजरात चोपड़ा पूजन व बेस्तू वरस दिवाली की रात व्यापारिक बही-खातों (चोपड़ा) की पूजा और अगले दिन गुजराती नववर्ष ('नूतन वर्षाभिनंदन') का भव्य उल्लास।
पंजाब बंदी छोड़ दिवस दिवाली के दिन ही सिख समुदाय द्वारा छठे गुरु श्री हरगोविंद साहिब जी की ग्वालियर किले से 52 राजाओं संग रिहाई की स्मृति में स्वर्ण मंदिर (हरिमंदिर साहिब) में दीपोत्सव।

रीति-रिवाज और स्थानीय लोककथाएं भले ही अलग-अलग हों, लेकिन हर घर की देहरी पर टिमटिमाता दीया पूरे राष्ट्र को सौहार्द, सकारात्मकता और एकता के एक ही सूत्र में पिरो देता है।