माउंट एवरेस्ट पर गहराता संकट !

पिघलती बर्फ, खोता अस्तित्व—माउंट एवरेस्ट पर बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप अब खतरे की घंटी बन चुका है।

माउंट एवरेस्ट पर गहराता संकट !

माउंट एवरेस्ट पर गहराता संकट: मानवीय गतिविधियों और अपशिष्ट से तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर

दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट केवल जलवायु परिवर्तन (ग्लोबल वॉर्मिंग) की मार ही नहीं झेल रही, बल्कि वहां लगातार बढ़ती मानवीय गतिविधियां भी इसके पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान पहुंचा रही हैं। नेपाली और अमेरिकी वैज्ञानिकों के हालिया शोध में एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है—एवरेस्ट बेस कैंप पर पर्वतारोहियों की भीड़, टेंटों से निकलने वाली ऊष्मा और मानव अपशिष्ट (विशेषकर यूरिन) के कारण हर साल लगभग 2,500 टन बर्फ पिघलकर पानी में तब्दील हो रही है।

ग्लेशियर पिघलने के प्रमुख स्थानीय कारण

ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण वैश्विक स्तर पर तापमान बढ़ रहा है, लेकिन बेस कैंप के आसपास स्थानीय कारक इस गति को कई गुना बढ़ा रहे हैं:

  • मानव अपशिष्ट और यूरिन का प्रभाव: चढ़ाई के मौसम (Climbing Season) के दौरान सैकड़ों पर्वतारोही और गाइड हफ्तों तक बेस कैंप पर रुकते हैं। खुले में या अनुचित तरीके से विसर्जित यूरिन का तापमान आसपास के बर्फीले वातावरण की तुलना में काफी अधिक होता है। इसमें मौजूद लवण और रसायन बर्फ के पिघलने के बिंदु (freezing point) को बदल देते हैं, जिससे ग्लेशियर की संरचना कमजोर होती है।

  • टेंट और मानवीय ऊष्मा: बेस कैंप पर सैकड़ों टेंटों की बस्ती बस जाती है। इन टेंटों के अंदर की गर्मी, खाना पकाने के स्टोव और मानव शरीर की ऊष्मा सीधे ग्लेशियर की सतह पर दबाव डालती है।

  • सूट और कार्बन कण: जनरेटर, हीटर और गैस बर्नर से निकलने वाले सूक्ष्म काले कण (ब्लैक कार्बन) जब बर्फ पर जमते हैं, तो वे सूर्य की किरणों को परावर्तित (Reflect) करने के बजाय सोखने लगते हैं, जिससे बर्फ तेजी से पिघलती है।

भविष्य में प्राकृतिक आपदा का खतरा

बर्फ के इस तरह तेजी से पिघलने से कई गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं:

  1. ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF): पिघलने वाला पानी ग्लेशियरों के बीच अस्थिर झीलें बना रहा है। इनके टूटने से निचले इलाकों में अचानक विनाशकारी बाढ़ आ सकती है।

  2. पेयजल संकट और प्रदूषण: स्थानीय शेरपा समुदाय और निचले क्षेत्रों के गांवों के लिए पीने का मुख्य स्रोत यही ग्लेशियर हैं। अपशिष्ट मिलने से जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं।

  3. पर्वतारोहण मार्गों की अस्थिरता: खुम्बू आइसफॉल और बेस कैंप की बर्फ खोखली होने से हिमस्खलन (Avalanche) और गहरी दरारें (Crevasses) बनने का जोखिम बढ़ गया है।

समाधान की दिशा में आवश्यक कदम

माउंट एवरेस्ट के अस्तित्व को बचाने के लिए अब केवल सामान्य कचरा प्रबंधन पर्याप्त नहीं है:

  • 'पूप बैग' और यूरिन स्टोरेज सिस्टम की सख्ती: सभी पर्वतारोहियों के लिए बेस कैंप और उससे ऊपर मानव अपशिष्ट को सीलबंद बैग और कंटेनरों में वापस नीचे लाना अनिवार्य किया जाए।

  • बेस कैंप का स्थानांतरण: वैज्ञानिक सुझाव दे रहे हैं कि बेस कैंप को ग्लेशियर वाली जगह से हटाकर नीचे किसी गैर-ग्लेशियल स्थान पर शिफ्ट किया जाए।

  • आगंतुकों की संख्या पर सीमा: प्रति सीजन जारी किए जाने वाले परमिटों की संख्या सीमित करना बेहद जरूरी है।

एवरेस्ट पर जमा हो रही गंदगी और पिघलते ग्लेशियर प्रकृति की एक गंभीर चेतावनी हैं। यदि समय रहते मानवीय हस्तक्षेप और अपशिष्ट प्रबंधन पर कड़े नियम लागू नहीं किए गए, तो यह धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल इतिहास बनकर रह जाएगी।