युवा देश, बुजुर्ग संसद: कहां हैं हमारे Gen Z नेता ?

भारत दुनिया का सबसे युवा देश है, लेकिन हमारी संसद इतिहास की सबसे 'उम्रदराज' संसद कैसे बन गई? 543 सांसदों में से Gen Z (25-27 साल) के सिर्फ 4 नेता! सड़क पर संघर्ष करने वाला युवा, संसद से गायब क्यों है?

युवा देश, बुजुर्ग संसद: कहां हैं हमारे Gen Z नेता ?

भारत दुनिया का सबसे युवा देश है, लेकिन जब बात हमारे देश के सर्वोच्च नीति-निर्माण मंच—संसद—की आती है, तो यह युवा ऊर्जा वहां से नदारद नजर आती है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों तक, जनरेशन जेड (Gen Z) यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी, हर जगह सबसे आगे है। लेकिन जब कानून बनाने की बात आती है, तो आखिर सदन में कितने Gen Z नेता मौजूद हैं?

सच्चाई यह है कि भारतीय राजनीति के शीर्ष स्तर पर युवाओं की नुमाइंदगी आज भी एक बहुत बड़ा भ्रम है। 

18वीं लोकसभा: इतिहास की सबसे 'उम्रदराज' संसद

अगर हम 2024 में चुनी गई 18वीं लोकसभा के आंकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर बहुत साफ हो जाती है। हमारे देश के मतदाताओं में 18-29 वर्ष की आयु के युवाओं की हिस्सेदारी लगभग 22.3% है, लेकिन संसद का दृश्य इसके बिल्कुल उलट है।

  • औसत आयु: 18वीं लोकसभा के सांसदों की औसत आयु 56 वर्ष है, जो कि भारतीय इतिहास में सबसे अधिक है।

  • युवा बनाम बुजुर्ग: 543 सांसदों में से 52% से अधिक सांसद 55 वर्ष से अधिक उम्र के हैं। वहीं, 35 वर्ष से कम आयु वाले सांसदों की संख्या महज 25 के करीब सिमट कर रह गई है।

भारत की पहली लोकसभा (1951-52) में सांसदों की औसत आयु 46.5 वर्ष थी और हर छठा सांसद 35 साल से कम उम्र का था। आज 2024 में, यह आंकड़ा गिरकर हर 20वें सांसद पर आ गया है।

सदन में Gen Z नेताओं की असली संख्या कितनी?

इस वक्त देश की लोकसभा और विधानसभाओं में Gen Z के केवल 26 विधायक और सांसद हैं। इनमें 6 लोकसभा सांसद (MP) और 20 विधायक (MLA) शामिल हैं। भारत में चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 25 वर्ष है, जिसके कारण इस आयु वर्ग (Gen Z) का एक बड़ा हिस्सा चुनाव लड़ने के योग्य ही नहीं है।

सदन में Gen Z नेताओं की असली संख्या कितनी?

2024 के लोकसभा चुनावों में, Gen Z श्रेणी के कुल 98 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था, जिनमें से केवल 6 युवा ही जीतकर संसद पहुंचने में कामयाब हुए। इन 6 युवा सांसदों का सही विवरण इस प्रकार है:

युवा सांसद का नाम आयु (वर्तमान) राजनीतिक दल राज्य (लोकसभा सीट)
सागर खंड्रे 28 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कर्नाटक (बीदर)
प्रियंका सतीश जारकीहोली 29 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कर्नाटक (चिक्कोडी)
संजना जाटव 28 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस राजस्थान (भरतपुर)
शांभवी चौधरी 28 लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) बिहार (समस्तीपुर)
पुष्पेंद्र सरोज 27 समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश (कौशांबी)
प्रिया सरोज 27 समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश (मछलीशहर)

विधानसभाओं (MLAs) में Gen Z की स्थिति

देश भर के कुल 4,131 विधायकों में से सिर्फ 20 विधायक Gen Z से आते हैं। अगर पार्टी के अनुसार देखें, तो सबसे ज्यादा 5 Gen Z विधायक भाजपा (BJP) के पास हैं, इसके बाद कांग्रेस के 4 और टीवीके (TVK) के 3 विधायक हैं। संसद की 543 सीटों में से Gen Z के पास सिर्फ 6 सीटें हैं! इसका मतलब है कि देश की सर्वोच्च पंचायत में Gen Z का प्रतिनिधित्व महज 1.1% है। युवा आबादी की इतनी बड़ी हिस्सेदारी होने के बावजूद, नीति-निर्माण के स्तर पर इस पीढ़ी की भागीदारी अभी भी बहुत सीमित है।

सड़क पर एक्टिव, पर संसद से बाहर क्यों?

युवा सड़कों पर बेरोजगारी, शिक्षा, जलवायु परिवर्तन और अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। छात्र राजनीति और विश्वविद्यालय परिसरों में उनका दबदबा है, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति के दरवाजे उनके लिए बंद क्यों हैं?

  1. बाहुबल और धनबल (Money and Muscle Power): भारतीय चुनाव लड़ना बेहद खर्चीला हो गया है। करोड़ों रुपये के चुनावी खर्च का भार उठाना एक आम 25-30 साल के युवा के लिए संभव नहीं है।

  2. टिकट वितरण की राजनीति: राजनीतिक दल आमतौर पर 'जिताऊ' उम्मीदवार पर दांव लगाते हैं। उनके लिए अनुभव और जातीय/क्षेत्रीय समीकरण ज्यादा मायने रखते हैं, जिसके चलते युवाओं को टिकट वितरण में दरकिनार कर दिया जाता है।

  3. पारिवारिक विरासत का एकाधिकार: जो मुट्ठी भर युवा संसद पहुंचते भी हैं, वे अक्सर स्थापित राजनेताओं के बेटे या बेटियां होते हैं। जमीनी स्तर से उठकर आने वाले युवाओं के लिए यह सीढ़ी बहुत लंबी और जटिल है।

  4. युवाओं को सिर्फ 'वोट बैंक' मानना: राजनीतिक दल युवाओं को लुभाने के लिए डिजिटल कैंपेन तो चलाते हैं, लेकिन जब नेतृत्व सौंपने की बारी आती है, तो वे उम्रदराज और अनुभवी नेताओं को ही आगे करते हैं।

बदलाव का रास्ता

सच्चाई यह है कि जिस देश का युवा सिर्फ रैलियों में भीड़ बढ़ाने या सोशल मीडिया पर ट्रेंड चलाने के काम आएगा और नीतियां बनाने वाले कमरों में उसकी कुर्सी नहीं होगी, वह देश अपने भविष्य के साथ न्याय नहीं कर सकता।

हमें एक ऐसी राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है जहां युवाओं को सिर्फ 'कल का नेता' न मानकर 'आज का भागीदार' माना जाए। राजनीतिक दलों को अपनी कमेटियों और टिकट वितरण में युवाओं के लिए एक निश्चित कोटा तय करने पर विचार करना चाहिए, ताकि सड़क का संघर्ष संसद की आवाज बन सके।