भारत में अब 'लू' (Heatwave) को मिला प्राकृतिक आपदा का दर्जा !

बढ़ता तापमान, बदलती नीतियां!जलवायु परिवर्तन की हकीकत को स्वीकारते हुए भारत ने लू को माना प्राकृतिक आपदा। प्रकृति का यह संकेत है कि अब हमें संभलना होगा।

भारत में अब 'लू' (Heatwave) को मिला प्राकृतिक आपदा का दर्जा !

भारत में अब लू भी मानी जाएगी प्राकृतिक आपदा, जानिए इससे क्या बदलेगा

भारत सरकार ने एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाते हुए 'लू' (Heatwaves) और 'आकाशीय बिजली' (Lightning) को राष्ट्रीय स्तर पर अधिसूचित प्राकृतिक आपदा (Notified Natural Disaster) की सूची में शामिल कर लिया है। अगस्त 2026 की शुरुआत में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने संसद में आधिकारिक तौर पर इसकी जानकारी दी।

इस अहम फैसले के बाद अब लू लगने से होने वाली बीमारियों, मौतों और राहत कार्यों के लिए राज्यों को केंद्र से विशेष फंड और सहायता मिल सकेगी। आइए विस्तार से जानते हैं कि इस फैसले के पीछे क्या कारण हैं और इससे आम जनता तथा राज्य सरकारों के लिए क्या बदलाव आएंगे।

फैसले के पीछे का कारण

यह फैसला 16वें वित्त आयोग (16th Finance Commission) की सिफारिशों के आधार पर लिया गया है। जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण मौसम में आ रहे अप्रत्याशित बदलावों और लगातार बढ़ती जानलेवा गर्मी को देखते हुए लंबे समय से यह मांग की जा रही थी कि लू को भी एक आपदा का दर्जा दिया जाए।

राज्य सरकारों के साथ-साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, नागरिक समाज (Civil Society) और पर्यावरण संस्थाओं (जैसे ग्रीनपीस इंडिया) ने कमजोर और खुले में काम करने वाले वर्गों की सुरक्षा के लिए यह बदलाव करने का भारी दबाव बनाया था।

अब तक क्या थे नियम?

  • सीमित आपदा सूची: अभी तक आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (Disaster Management Act, 2005) के तहत केवल 12 श्रेणियों (चक्रवात, सूखा, भूकंप, आग, बाढ़, सुनामी, ओलावृष्टि, भूस्खलन, हिमस्खलन, बादल फटना, कीट हमला और शीतलहर/पाला) को ही प्राकृतिक आपदा माना जाता था।

  • फंडिंग की सख्त पाबंदी: लू को अब तक राष्ट्रीय आपदा न मानकर केवल एक "स्थानीय आपदा" (Local Disaster) के रूप में देखा जाता था। इस वजह से राज्य सरकारें लू से निपटने या राहत कार्यों के लिए अपने 'राज्य आपदा मोचन निधि' (SDRF) का अधिकतम केवल 10% हिस्सा ही खर्च कर सकती थीं।

इस फैसले से क्या बदलाव आएगा?

लू को प्राकृतिक आपदा घोषित करने से आपदा प्रबंधन और राहत कार्यों के बजट पर सीधा असर पड़ेगा:

  1. SDRF का पूरा उपयोग: अब राज्य सरकारें लू से जुड़े बचाव, राहत और पुनर्वास कार्यों के लिए अपने वार्षिक 'राज्य आपदा मोचन निधि' (SDRF) का बिना किसी 10% की लिमिट के पूरा उपयोग कर सकेंगी।

  2. NDRF से मिलेगी मदद: यदि किसी राज्य का अपना फंड स्थिति को संभालने के लिए कम पड़ता है, तो वह 'राष्ट्रीय आपदा मोचन निधि' (NDRF) के तहत केंद्र सरकार से अतिरिक्त आर्थिक सहायता प्राप्त कर सकेगा।

  3. मुआवजा और स्वास्थ्य सेवाएं: हीटस्ट्रोक या लू से जान गंवाने वालों के परिवारों को वित्तीय मुआवजा देना अब ज्यादा आसान हो जाएगा। साथ ही, अस्पतालों में लू से निपटने के लिए आपातकालीन व्यवस्थाएं मजबूत की जा सकेंगी।

  4. हीट एक्शन प्लान और बचाव कार्य (Mitigation): लंबी अवधि के बचाव कार्यों, जैसे—सार्वजनिक शेल्टर बनाना, कूलिंग सेंटर स्थापित करना और मजदूरों के लिए हीट रिस्क इंश्योरेंस मुहैया कराने के लिए 'आपदा न्यूनीकरण कोष' (Disaster Mitigation Funds) का इस्तेमाल किया जा सकेगा।

आंकड़े क्या कहते हैं?

सरकारी और नेशनल हीट-रिलेटेड इलनेस एंड डेथ सर्विलांस (National Heat-Related Illness and Death Surveillance) के 2026 के हालिया आंकड़ों के अनुसार:

  • हीटस्ट्रोक के मामले: 1 मार्च से 26 जुलाई 2026 के बीच देश में हीटस्ट्रोक (लू लगने) के करीब 4,853 आधिकारिक मामले सामने आए हैं।

  • सबसे प्रभावित राज्य: तेलंगाना में सबसे अधिक मामले (915) दर्ज किए गए। इसके बाद पश्चिम बंगाल (733), छत्तीसगढ़ (660) और आंध्र प्रदेश (540) का नंबर आता है।

  • मृत्यु दर: इसी अवधि में लू के कारण कम से कम 20 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जिनमें सबसे अधिक 11 मौतें महाराष्ट्र से रिपोर्ट की गईं।

लू को प्राकृतिक आपदा मानने का यह फैसला भारत के क्लाइमेट एक्शन में एक बड़ा मील का पत्थर है। इस कदम से न सिर्फ आपदा प्रबंधन मजबूत होगा, बल्कि उन लाखों दिहाड़ी मजदूरों, रेहड़ी-पटरी वालों और किसानों को सीधी राहत मिलेगी, जिन्हें भीषण गर्मी के बीच अपनी आजीविका के लिए संघर्ष करना पड़ता है।