चीन ने बनाया अपना 'कृत्रिम सूरज' जो असली सूरज से भी 6 गुना ज्यादा है गर्म !

चीन का न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्टर 'EAST' महाशक्तिशाली चुंबकों के दम पर तैयार कर रहा है स्वच्छ ऊर्जा का नया जरिया।

चीन ने बनाया अपना 'कृत्रिम सूरज' जो असली सूरज से भी 6 गुना ज्यादा है गर्म !

चीन का 'कृत्रिम सूरज': 10 करोड़ डिग्री सेल्सियस ऊर्जा और शक्तिशाली चुंबक का कमाल

चीन ऊर्जा के क्षेत्र में एक नया इतिहास रचने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना असीमित बिजली पैदा करने के लिए वैज्ञानिक 'कृत्रिम सूरज' (Artificial Sun) यानी EAST (Experimental Advanced Superconducting Tokamak) प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं।

यह तकनीक असली सूरज की तरह ही न्यूक्लियर फ्यूजन (परमाणु संलयन) पर आधारित है, जिसका तापमान 10 करोड़ डिग्री सेल्सियस से भी अधिक पहुंच सकता है — जो असली सूरज के केंद्र (कोर) के तापमान (लगभग 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस) से करीब 6 गुना ज्यादा है।

महाशक्तिशाली चुंबक का क्या काम है?

10 करोड़ डिग्री से अधिक तापमान पर कोई भी ठोस धातु या बर्तन पिघल जाएगा। ऐसे में इस अत्यधिक गर्म प्लाज्मा (Plasma) को किसी भौतिक दीवार से छुए बिना नियंत्रित करना सबसे बड़ी चुनौती होती है।

  • सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट (Superconducting Magnets): रिएक्टर के अंदर एक बेहद मजबूत चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) बनाया जाता है।

  • डोनाट-आकार की संरचना (Tokamak): इस चुंबकीय क्षेत्र की मदद से सुपर-हॉट प्लाज्मा को एक डोनट के आकार के चैंबर में हवा में ही रोके (Contain) रखा जाता है, जिससे यह रिएक्टर की दीवारों को नहीं छूता।

न्यूक्लियर फ्यूजन vs न्यूक्लियर फिजन

  • फिजन (परमाणु विखंडन): मौजूदा परमाणु बिजलीघरों में यूरेनियम जैसे भारी तत्वों को तोड़ा जाता है, जिससे खतरनाक रेडियोधर्मी कचरा (Radioactive Waste) पैदा होता है।

  • फ्यूजन (परमाणु संलयन): इसमें हाइड्रोजन के हल्के परमाणुओं को आपस में जोड़कर हीलियम और अपार ऊर्जा बनाई जाती है। यह प्रक्रिया पूरी तरह से स्वच्छ है और इसमें विस्फोट या तबाही का खतरा बेहद कम होता है।

भविष्य पर असर

यदि वैज्ञानिक लंबे समय तक इस प्लाज्मा को स्थिर रखकर व्यावसायिक स्तर पर बिजली उत्पादन में सफल होते हैं, तो यह दुनिया को असीमित और सस्ती स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) प्रदान करेगा, जिससे जीवाश्म ईंधन (कोयला और तेल) पर निर्भरता पूरी तरह खत्म हो सकती है।