गुजरात चुनाव 2026: क्या टूटेंगी 'प्रॉक्सी पॉलिटिक्स' की बेड़ियाँ?
गुजरात निकाय चुनाव में 50% महिला आरक्षण के बावजूद 'प्रॉक्सी पॉलिटिक्स' और 'सरपंच पति' कल्चर एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
गुजरात निकाय चुनाव: 50% आरक्षण के बीच क्या महिलाएं केवल 'प्रॉक्सी' बनकर रह गई हैं?
गुजरात में स्थानीय स्वशासन के चुनावों में महिलाओं की 50% हिस्सेदारी कानूनन अनिवार्य है। इसका उद्देश्य महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करना और उन्हें नेतृत्व का मौका देना था। लेकिन चुनाव के मैदान से लेकर सत्ता की कुर्सी तक एक सवाल हमेशा खड़ा रहता है— क्या महिला उम्मीदवार स्वतंत्र रूप से काम कर रही हैं या वे केवल अपने घर के पुरुषों (पति, पिता या भाई) का चेहरा मात्र हैं?
'सरपंच पति' और 'प्रॉक्सी' का बढ़ता चलन
गुजरात के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में एक शब्द बहुत प्रसिद्ध है— 'पति राज'। कई सीटों पर जब महिला आरक्षण लागू होता है, तो स्थानीय दबंग या राजनेता अपनी पत्नी या परिवार की महिला को चुनाव लड़वाते हैं। जीतने के बाद, कुर्सी पर महिला बैठती है, लेकिन फाइलें साइन करना, सभाओं में बोलना और विकास कार्यों का निर्णय लेना उनके पति या पुरुष रिश्तेदार ही करते हैं। इसे ही राजनीति में 'प्रॉक्सी पॉलिटिक्स' कहा जाता है।
क्यों बनी रहती है यह स्थिति?
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सामाजिक ढांचा: पितृसत्तात्मक समाज में आज भी कई जगह माना जाता है कि राजनीति 'पुरुषों का काम' है।
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जागरूकता की कमी: कई महिला उम्मीदवार अपनी शक्तियों और संवैधानिक अधिकारों से पूरी तरह वाकिफ नहीं होतीं।
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पारिवारिक दबाव: घर की महिलाओं को चुनाव में उतारना अक्सर एक 'मजबूरी' होती है ताकि परिवार की राजनीतिक पकड़ बनी रहे।
सिक्के का दूसरा पहलू: सफल महिला नेतृत्व
हालाँकि स्थिति पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। गुजरात के कई जिलों में ऐसी महिला सरपंच और कॉर्पोरेटर्स भी उभरकर आई हैं जिन्होंने 'प्रॉक्सी' के टैग को तोड़ दिया है। डिजिटल शिक्षा, सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर महिला प्रतिनिधियों ने शानदार काम किया है। शिक्षा के बढ़ते स्तर के साथ अब महिलाएं फाइलों को खुद पढ़ रही हैं और अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं।
बदलाव की जरूरत
सिर्फ आरक्षण दे देना काफी नहीं है। महिलाओं को 'प्रॉक्सी' बनने से रोकने के लिए ये कदम जरूरी हैं:
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क्षमता निर्माण (Capacity Building): महिला प्रतिनिधियों के लिए विशेष ट्रेनिंग प्रोग्राम होने चाहिए।
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सख्त कानून: मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्यों ने 'सरपंच पतियों' के आधिकारिक बैठकों में शामिल होने पर प्रतिबंध लगाया है, ऐसा ही सख्ती गुजरात में भी जरूरी है।
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जागरूकता: मतदाताओं को भी चेहरा नहीं, बल्कि उम्मीदवार की काबिलियत देखनी होगी।
महिलाएं अब केवल वोट बैंक नहीं हैं, वे भविष्य की नेता हैं। गुजरात के आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कितनी महिलाएं 'प्रॉक्सी' की छाया से बाहर निकलकर असल मायने में 'सशक्त नेता' के रूप में खुद को स्थापित करती हैं।
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