चुनावी सरगर्मियों के बिच कॉर्पोरेटर की असली चुनौतियों पर एक नज़र !
एक कॉर्पोरेटर पूरे वार्ड के प्रबंधन और जनता की समस्याओं के लिए 24 घंटे जवाबदेह होता है, लेकिन उसकी तुलना में मिलने वाला मानदेय अत्यंत कम है।
कॉर्पोरेटर: वेतन कम, जिम्मेदारी ज्यादा ! क्या वाकई यह सिर्फ 'सेवा' है?
भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में नगर निगम (Municipal Corporation) सबसे जमीनी स्तर पर काम करने वाली संस्था है। यहाँ का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा होता है— कॉर्पोरेटर या पार्षद। अक्सर हम उन्हें चुनाव के वक्त हाथ जोड़ते या किसी उद्घाटन में रिबन काटते देखते हैं, लेकिन इस चमक-धमक के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है: बेहिसाब जिम्मेदारी और नाममात्र का वेतन।
1. वार्ड का 'मैनेजर' पर वेतन 'शून्य' के बराबर
एक कॉर्पोरेटर के पास अपने वार्ड की हर छोटी-बड़ी समस्या का जिम्मा होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उन्हें मिलने वाला पैसा 'वेतन' (Salary) नहीं, बल्कि 'मानदेय' (Honorarium) कहलाता है?
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राज्यों का अंतर: दिल्ली में यह राशि लगभग ₹25,000 है, तो महाराष्ट्र में ₹25,000 के आसपास। वहीं कई राज्यों में यह महज ₹2,000 से ₹5,000 प्रति माह है।
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दैनिक खर्च: एक पार्षद को दिन भर में दर्जनों लोगों से मिलना पड़ता है, चाय-पानी का खर्च उठाना पड़ता है और वार्ड में घूमने का पेट्रोल खर्च भी खुद ही वहन करना होता है।
2. जिम्मेदारियों का अंबार (24x7 ड्यूटी)
एक कॉर्पोरेटर का काम सुबह 6 बजे से शुरू होकर रात देर गए तक चलता है। उनकी प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल हैं:
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बुनियादी सुविधाएं: सड़क, बिजली (स्ट्रीट लाइट), पानी की सप्लाई और साफ-सफाई।
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प्रशासनिक कड़ी: जनता और नगर निगम के अधिकारियों (Commissioner/Engineers) के बीच सेतु का काम करना।
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जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र: कई सरकारी कागजातों के सत्यापन के लिए लोग पार्षद के पास ही दौड़ते हैं।
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शिकायत निवारण: नाली चोक होने से लेकर पड़ोसी के झगड़े तक, पार्षद को हर मोर्चे पर खड़ा होना पड़ता है।
3. भारी दबाव और सामाजिक अपेक्षाएं
जनता को इस बात से सरोकार नहीं होता कि पार्षद का वेतन कितना है। उनके लिए पार्षद ही 'सरकार' है।
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निजी जीवन का अभाव: पार्षद का घर अक्सर एक 'पब्लिक ऑफिस' बन जाता है, जहाँ किसी भी वक्त कोई भी अपनी समस्या लेकर आ सकता है।
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राजनीतिक खर्च: पार्टी के कार्यक्रम, रैलियां और सामाजिक उत्सवों (शादी-ब्याह, अंतिम संस्कार) में शामिल होना और वहां दान-दक्षिणा देना भी एक अघोषित जिम्मेदारी बन जाती है।
क्या कम वेतन भ्रष्टाचार का कारण है?
विशेषज्ञों का मानना है कि जब एक निर्वाचित प्रतिनिधि की आधिकारिक आय उसके खर्चों से बहुत कम होती है, तो व्यवस्था में भ्रष्टाचार (Corruption) के रास्ते खुल जाते हैं।
"यदि हम चाहते हैं कि पढ़े-लिखे और ईमानदार युवा राजनीति में आएं, तो हमें उन्हें एक सम्मानजनक वेतन देना होगा ताकि वे बिना किसी लालच के जनता की सेवा कर सकें।"
कॉर्पोरेटर को 'वार्ड का अनकहा मैनेजर' कहना गलत नहीं होगा। वे शहर के विकास की नींव रखते हैं, लेकिन बदले में उन्हें जो आर्थिक सुरक्षा मिलती है, वह चिंताजनक है। यह सोचने का विषय है कि क्या हम अपने प्रतिनिधियों से 'प्रोफेशनल' काम की उम्मीद तो रखते हैं, लेकिन उन्हें 'वॉलिंटियर' वाला मेहनताना देकर उनके साथ न्याय कर रहे हैं?
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