15 राज्यों में सूखा, कहीं मूसलाधार पानी...

बादल वही, नीला आसमां वही... फिर ये कैसा दोहरी चाल? कहीं डूबे शहर, तो कहीं सूखे का हाल!

15 राज्यों में सूखा, कहीं मूसलाधार पानी...

हमारे देश में मानसून का आगमन हर साल उम्मीदें लेकर आता है, लेकिन इस बार का मानसून कई राज्यों में चिंता का कारण बना हुआ है। देश के 15 से अधिक राज्यों में मानसून की बारिश भारी कमी (कम से कम 72% तक के शुरुआती/क्षेत्रीय घाटे) से जूझ रही है। एक तरफ जहां कुछ इलाकों में बाढ़ जैसे हालात हैं, वहीं दूसरी तरफ कई राज्यों में खेत सूखे पड़े हैं और किसान बारिश का इंतजार कर रहे हैं।

मानसून के इस 'दोहरे व्यवहार' के पीछे वैज्ञानिक और जलवायु संबंधी कारण हैं।

1. मानसून का असमान फैलाव: क्यों कहीं सूखा, कहीं बारिश?

मौसम विज्ञानियों के अनुसार, मानसून की कवरेज (कवरेज की तारीख) और बारिश की मात्रा/समानता में बहुत अंतर होता है। पूरे देश में मानसूनी हवाएं पहुंच जाने का यह मतलब नहीं होता कि हर जिले में बराबर बारिश होगी।

इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

1. मानसून ट्रफ की स्थिति (Monsoon Trough Shift)

मानसून ट्रफ कम दबाव की वह रेखा होती है जो बारिश वाले बादलों को खींचती है। जब यह ट्रफ दक्षिण या मध्य भारत की ओर झुकती है, तो गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भारी बारिश होती है। लेकिन जब यह खिसककर हिमालय की तलहटी (उत्तर भारत) की तरफ चली जाती है, तो मैदानी इलाकों (जैसे यूपी, बिहार, पंजाब) में बारिश थम जाती है। इसे 'मानसून ब्रेक' कहा जाता है।

2. कम दबाव के क्षेत्रों (Low-Pressure Systems) का मार्ग

मानसून के दौरान बंगाल की खाड़ी में बनने वाले 'कम दबाव के क्षेत्र' (Low-Pressure Areas) ही देश के अंदरूनी हिस्सों में पानी लाते हैं। यदि ये सिस्टम दक्षिण-पश्चिम दिशा (ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश) की ओर बढ़ जाते हैं, तो उत्तरी और पूर्वी राज्य (बिहार, झारखंड, पूर्वी यूपी) सूखे रह जाते हैं।

3. जलवायु परिवर्तन और समुद्र का तापमान (Climate Change & Sea Temperatures)

ग्लोबल वार्मिंग के कारण अरब सागर और हिंद महासागर का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। गर्म वातावरण में नमी धारण करने की क्षमता तो बढ़ती है, लेकिन यह नमी लगातार बरसने के बजाय कम समय में एक ही जगह बेहद मूसलाधार बारिश (Extreme Rainfall) के रूप में गिरती है। नतीजतन, कई दिन तक सूखा रहता है और फिर एक दिन में पूरे महीने का पानी गिर जाता है।

4. एल नीनो (El Niño) और वैश्विक कारक

प्रशांत महासागर में 'एल नीनो' की स्थिति मानसूनी हवाओं के प्रवाह को कमजोर कर देती है, जिससे मानसूनी बादलों का देश के सभी हिस्सों में समान रूप से पहुँचना मुश्किल हो जाता है।

2. किन राज्यों पर पड़ रही है सबसे ज्यादा मार?

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और कृषि सांख्यिकी आंकड़ों के अनुसार, कई प्रमुख कृषि-प्रधान राज्यों में मानसून की सुस्ती दर्ज की गई है:

  • उत्तर और पूर्वी भारत: बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल और असम/पूर्वोत्तर राज्य।

  • उत्तर-पश्चिम भारत: पंजाब, हरियाणा और केरल के कुछ हिस्से।

  • दक्षिण भारत: कर्नाटक और तेलंगाना के कुछ आंतरिक इलाके।

खेती पर असर: जून और जुलाई का महीना खरीफ फसलों (धान, सोयाबीन, दलहन और मक्का) की बुआई और रोपाई के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। बारिश में देरी से सिंचाई पर लागत बढ़ती है और फसलों की उपज प्रभावित होने का खतरा मंडराने लगता है।

3. क्या बिना बरसे ही गुजर जाएगा मानसून?

नहीं, मानसून बिना बरसे नहीं गुजरेगा। मौसम वैज्ञानिकों और IMD के पूर्वानुमान के अनुसार, मानसून के दूसरे चरण में रिकवरी होने की पूरी संभावना रहती है।

  • अगस्त-सितंबर में रिकवरी की उम्मीद: भारतीय मानसून का चक्र 4 महीनों (जून से सितंबर) का होता है। अक्सर जून-जुलाई में सुस्त रहने वाला मानसून अगस्त और सितंबर में मजबूत बंगाल की खाड़ी के सिस्टम्स के कारण अच्छी बारिश कराता है।

  • मौसम प्रणाली में बदलाव: जैसे-जैसे हिंद महासागर में परिस्थितियां अनुकूल होती हैं (जैसे पॉजिटिव IOD), मानसून ट्रफ दोबारा सक्रिय होकर सूखे इलाकों में झमाझम बारिश लाती है।

क्या ध्यान रखना ज़रूरी है?

मानसून अभी खत्म नहीं हुआ है, लेकिन इसका पैटर्न पूरी तरह बदल चुका है। अब 'लगातार और हल्की रिमझिम बारिश' के दिन कम हो गए हैं और 'लंबे सूखे के बाद अचानक तेज बारिश' का दौर बढ़ रहा है।