'इच्छामृत्यु' से श्मशान तक:हरीश राणा की 11 साल की जंग... अब राख में तब्दील !
हरीश राणा ने 11 साल तक बिस्तर पर बेजान रहकर 'वेजिटेटिव स्टेट' में एक लंबा और कष्टदायी संघर्ष झेला, जिसके बाद उनके माता-पिता ने अदालत से उनके लिए 'इच्छामृत्यु' की मांग की थी।
'इच्छामृत्यु' से श्मशान तक... जानिए हरीश राणा के 'आखिरी सफर' की दर्दनाक कहानी
जीवन और मृत्यु के बीच के उस धुंधले गलियारे में, जहाँ सांसें बोझ बन जाती हैं और बिस्तर ही पूरी दुनिया, वहीं से शुरू होती है हरीश राणा की कहानी। एक ऐसी कहानी जिसका अंत श्मशान घाट की राख के साथ हुआ, लेकिन जो पीछे छोड़ गई गरिमापूर्ण मृत्यु (Dignity in Death) की एक लंबी और दर्दनाक बहस।
11 साल का 'बिस्तर का कारावास'
हरीश राणा का संघर्ष आज का नहीं था। पिछले 11 सालों से वह एक 'वेजिटेटिव स्टेट' (Vegetative State) में थे। एक दुर्घटना या गंभीर बीमारी (मामले के अनुसार) ने उन्हें बिस्तर पर ऐसा जकड़ा कि उनके शरीर ने उनका साथ छोड़ दिया। न वह बोल सकते थे, न चल सकते थे और न ही अपनी मर्जी से अपनी आँखें फेर सकते थे। उनके लिए हर एक दिन मौत से बदतर था।
माता-पिता की बेबसी और अदालत का दरवाजा
हरीश के बुजुर्ग माता-पिता ने उन्हें तिल-तिल मरते देखा। अपनी आर्थिक तंगी और ढलती उम्र के कारण जब वे हरीश की देखभाल करने में असमर्थ होने लगे, तो उन्होंने भारी मन से एक ऐसा फैसला किया जिसे कोई भी माता-पिता नहीं करना चाहते— 'इच्छामृत्यु' की मांग।
उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई कि उनके बेटे को इस असहनीय पीड़ा से मुक्ति दी जाए। उन्होंने दलील दी कि हरीश केवल मशीनों और नली के सहारे जीवित है, और उसके ठीक होने की कोई गुंजाइश नहीं है।
कानूनी पेंच और 'पैसिव यूथेनेशिया'
भारत में 'एक्टिव यूथेनेशिया' (जहर का इंजेक्शन देकर मारना) गैरकानूनी है, लेकिन 'पैसिव यूथेनेशिया' (Passive Euthanasia) यानी जीवन रक्षक प्रणाली को हटा लेना, कुछ कड़े नियमों के साथ मान्य है। हरीश के मामले में मेडिकल बोर्ड का गठन हुआ, लंबी सुनवाई हुई। अदालत ने गरिमा के साथ जीने के अधिकार (Article 21) के साथ-साथ गरिमा के साथ मरने के अधिकार पर भी चर्चा की।
आखिरी सफर: दर्द का अंत
लंबी कानूनी लड़ाई और डॉक्टरों की रिपोर्ट के बाद, जब यह स्पष्ट हो गया कि हरीश का मस्तिष्क पूरी तरह मृत प्राय है और सुधार असंभव है, तब कानून ने अपना रास्ता बनाया।
हरीश का 'आखिरी सफर' अस्पताल के सफेद गलियारों से शुरू होकर श्मशान की आग तक पहुँचा। उनके माता-पिता के लिए यह क्षण दोहरी मार जैसा था—एक तरफ अपने जवान बेटे को खोने का गम और दूसरी तरफ उसे इस नारकीय जीवन से मुक्ति मिलने का सुकून। जब उनकी चिता को अग्नि दी गई, तो वह सिर्फ एक शरीर का अंत नहीं था, बल्कि 11 साल के उस मौन संघर्ष का भी अंत था जिसने पूरे देश को 'इच्छामृत्यु' के मानवीय पहलू पर सोचने पर मजबूर कर दिया।

एक बड़ा सवाल छोड़ गई यह कहानी
हरीश राणा की कहानी समाज के सामने कई सवाल छोड़ गई है:
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क्या जीवन सिर्फ सांस लेना है, या उसकी गुणवत्ता (Quality of Life) अधिक मायने रखती है?
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क्या राज्य और समाज को ऐसे परिवारों की मदद के लिए और अधिक संवेदनशील नीति नहीं बनानी चाहिए?
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