RBI की नई तैयारी: क्या महंगे होने के बावजूद भारत में चलेंगे प्लास्टिक के नोट?
शुरुआती छपाई में प्लास्टिक (पॉलीमर) का एक नोट छापना कागजी नोट से 2 से 3 गुना ज्यादा महंगा होता है! लेकिन फिर भी दुनिया भर के देश और RBI इसे अपनाने पर विचार क्यों कर रहे हैं?
हाल के दिनों में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा पारंपरिक कागजी नोटों की जगह पॉलीमर (प्लास्टिक) के नोट जारी करने के प्रस्ताव पर विचार करने की खबरें चर्चा में रही हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्लास्टिक का नोट छापना कागजी नोट से सस्ता है या महंगा?
आइए जानते हैं कि प्लास्टिक करेंसी को बनाने में कितना खर्च आता है और यह वर्तमान व्यवस्था से कितनी अलग है।
शुरुआती छपाई लागत: प्लास्टिक बनाम कागज
अगर सिर्फ शुरुआती छपाई (Initial Production Cost) की बात की जाए, तो प्लास्टिक के नोट कागजी नोटों की तुलना में 2 से 3 गुना तक महंगे होते हैं।
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कागजी नोटों की लागत: वर्तमान में RBI जो नोट छापता है, वे पूरी तरह कागज के नहीं बल्कि 100% कपास (Cotton Pulp) से बने होते हैं। इनकी छपाई की लागत मूल्यवर्ग (Denomination) के हिसाब से अलग-अलग होती है। औसतन एक कागजी नोट को छापने का खर्च ₹1 से ₹3 के बीच आता है (जैसे ₹100 के नोट के लिए लगभग ₹1.51 से ₹1.77 और ₹500 के नोट के लिए लगभग ₹2.29 का खर्च आता है)।
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प्लास्टिक (पॉलीमर) नोटों की अनुमानित लागत: प्लास्टिक नोटों के निर्माण में एक विशेष प्रकार के 'बायअक्षीय ओरिएंटेड पॉलीप्रोपाइलीन' (BOPP) सिंथेटिक प्लास्टिक सबस्ट्रेट का उपयोग किया जाता है। इनमें अत्याधुनिक सुरक्षा फीचर्स, पारदर्शी खिड़कियां और विशेष होलोग्राफिक तत्व शामिल होते हैं। इस उच्च तकनीक के कारण एक प्लास्टिक नोट को छापने की शुरुआती लागत ₹2 से ₹6 प्रति नोट तक आ सकती है।
महंगा होने के बावजूद RBI क्यों कर रहा है विचार?
शुरुआती लागत अधिक होने के बाद भी दुनिया भर के केंद्रीय बैंक और अब RBI पॉलीमर नोटों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। इसके पीछे का गणित बेहद दिलचस्प है:
1. लंबा जीवनकाल (High Durability)
कागज के नोट भारतीय मौसम (नमी, पसीना) और अत्यधिक रफ-यूज़ के कारण बहुत जल्दी फट या गल जाते हैं, जिन्हें 'सॉइल्ड नोट्स' (Soiled Notes) कहा जाता है। हर साल केंद्रीय बैंक को करोड़ों रुपये ऐसे खराब नोटों को नष्ट करने और उनकी जगह नए नोट छापने में खर्च करने पड़ते हैं। इसके विपरीत, प्लास्टिक के नोट वॉटरप्रूफ (Waterproof) होते हैं, आसानी से फटते नहीं हैं और इनका जीवनकाल कागजी नोटों की तुलना में 4 से 5 गुना अधिक होता है।
2. दीर्घकालिक बचत (Long-term Cost Effectiveness)
भले ही शुरू में प्लास्टिक नोट छापना महंगा है, लेकिन चूंकि ये लंबे समय तक चलते हैं, इसलिए केंद्रीय बैंक को इन्हें बार-बार बदलने के लिए नए नोट छापने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लॉन्ग-टर्म में इससे सरकार और RBI के हजारों करोड़ रुपये बचेंगे।
3. जालसाजी पर लगाम (Anti-Counterfeiting)
प्लास्टिक के नोटों पर एडवांस्ड सिक्योरिटी फीचर्स को शामिल करना आसान होता है। इनकी हूबहू नकल तैयार करना नकली नोट छापने वालों के लिए लगभग असंभव होता है, जिससे देश में जाली करेंसी की समस्या पर लगाम कसी जा सकती है।
मौजूदा स्थिति: सोशल मीडिया पर चल रहे उन दावों को प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) ने पूरी तरह खारिज किया है जिसमें कहा जा रहा था कि कागजी नोट पूरी तरह बंद होने जा रहे हैं। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा के अनुसार, भारत में पॉलीमर नोटों को पेश करने की योजना अभी बेहद शुरुआती (Preliminary) चरण में है और इस पर गहन अध्ययन किया जा रहा है।
ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और ब्रिटेन जैसे कई देश पहले ही पूरी तरह से पॉलीमर करेंसी अपना चुके हैं और वहां इसके बेहद सकारात्मक परिणाम देखे गए हैं।
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