पेट्रोल-डीजल पर राहत की भारी कीमत, 15 दिनों में सरकारी खजाने को ₹7000 करोड़ का 'फटका'
पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी कटौती से सरकारी खजाने को लगा ₹7000 करोड़ का फटका। CBIC ने जारी किए चौंकाने वाले आंकड़े। जानिए ईरान-इजरायल युद्ध के बीच मोदी सरकार के इस बड़े फैसले का असर।
नई दिल्ली | न्यूज़ डेस्क पश्चिम एशिया (ईरान-इजरायल) में गहराते युद्ध संकट के बीच मोदी सरकार ने देश के आम नागरिकों को महंगाई से बचाने के लिए एक बड़ा 'मास्टरस्ट्रोक' खेला है, लेकिन इसकी कीमत सरकारी खजाने को चुकानी पड़ रही है। केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) के चेयरमैन विवेक चतुर्वेदी ने आज आधिकारिक आंकड़ों के साथ इस भारी नुकसान की पुष्टि की है।
राजस्व को बड़ा नुकसान
CBIC चेयरमैन के अनुसार, पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में की गई हालिया कटौती से सरकार को महज 15 दिनों के भीतर ₹7,000 करोड़ के राजस्व का घाटा होगा। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो सालाना आधार पर यह नुकसान ₹1.70 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है।
टैक्स में कितनी हुई कटौती?
सरकार ने तेल की कीमतों को स्थिर रखने के लिए टैक्स के ढांचे में बड़ा बदलाव किया है:
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पेट्रोल: उत्पाद शुल्क ₹13 प्रति लीटर से घटाकर केवल ₹3 प्रति लीटर कर दिया गया।
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डीजल: उत्पाद शुल्क ₹10 प्रति लीटर से घटाकर शून्य (0) कर दिया गया।
जनता को क्यों नहीं मिल रही सीधी राहत?
भले ही सरकार ने टैक्स में ₹10 की कटौती की है, लेकिन पेट्रोल पंपों पर कीमतें कम होने की उम्मीद फिलहाल कम है। इसका मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Brent Crude) का $122 प्रति बैरल के पार पहुंच जाना है।
पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने स्पष्ट किया कि तेल विपणन कंपनियां (OMCs) पहले से ही पेट्रोल पर ₹24 और डीजल पर ₹30 प्रति लीटर का नुकसान झेल रही थीं। इस टैक्स कटौती का उद्देश्य उपभोक्ताओं के लिए दाम घटाना नहीं, बल्कि कीमतों को और बढ़ने से रोकना है।
सरकार ने क्यों लिया यह फैसला?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोशल मीडिया पर बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लक्ष्य नागरिकों को वैश्विक अस्थिरता से बचाना है। सरकार ने दो विकल्पों में से एक को चुना: या तो कीमतें बेतहाशा बढ़ाई जाएं या सरकार खुद वित्तीय बोझ उठाए। सरकार ने जनता के हित में दूसरा विकल्प चुना है।
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