महिला आरक्षण बिल लोकसभा में नहीं हुआ पास, अभी 2 और विधेयक पाइपलाइन में...
दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण महिला आरक्षण संशोधन विधेयक लोकसभा में गिर गया है, जिससे 2029 में इसे लागू करने की योजना फिलहाल टल गई है।
लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 के गिर जाने से देश की राजनीति में एक नया मोड़ आ गया है। 17 अप्रैल 2026 को हुए मतदान में सरकार को आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका, जिसके कारण महिला आरक्षण को 2029 से लागू करने और सीटों की संख्या बढ़ाने की योजना फिलहाल अटक गई है।
1. लोकसभा में क्या हुआ?
शुक्रवार शाम को हुए मतदान में सदन में मौजूद 528 सदस्यों में से 298 ने पक्ष में और 230 ने विपक्ष में वोट दिया। संविधान संशोधन के लिए कम से कम 352 वोटों (दो-तिहाई) की जरूरत थी। बहुमत न मिलने के कारण यह बिल पारित नहीं हो सका।
विपक्ष, विशेषकर INDIA गठबंधन, ने इसे "लोकतंत्र की जीत" बताया है। विपक्ष का मुख्य विरोध महिला आरक्षण को परिसीमन (Delimitation) के साथ जोड़ने पर था, जिससे दक्षिण भारतीय राज्यों की सीटें कम होने का डर जताया जा रहा था।
2. पाइपलाइन में मौजूद अन्य दो विधेयकों का क्या होगा?
सरकार इस बार तीन विधेयकों का एक पूरा 'पैकेज' लेकर आई थी। मुख्य संशोधन बिल गिरने के बाद, सरकार ने अन्य दो विधेयकों को भी वापस (Shelve) ले लिया है। ये विधेयक थे:
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परिसीमन विधेयक 2026: इसके तहत 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का नया निर्धारण होना था।
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केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक: इसके जरिए पुडुचेरी और दिल्ली जैसी विधानसभाओं में महिला कोटा लागू करना था।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया कि चूंकि ये तीनों बिल एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, इसलिए मुख्य बिल के बिना बाकी दो को आगे बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
3. अब मोदी सरकार के पास क्या विकल्प हैं?
बिल के गिरने के बाद सरकार के पास रणनीतिक रूप से तीन रास्ते बचते हैं:
A. 2023 के मूल कानून पर वापस जाना
याद रहे कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम (2023) पहले से ही कानून बन चुका है और सरकार ने इसे 16 अप्रैल 2026 से प्रभावी घोषित कर दिया है। हालांकि, मूल कानून के अनुसार आरक्षण तभी लागू होगा जब:
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नई जनगणना (Census) पूरी हो जाए।
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उस जनगणना के आधार पर नया परिसीमन हो। इस प्रक्रिया में समय लगेगा, जिसका मतलब है कि आरक्षण अब 2029 के बजाय 2034 या उसके बाद ही लागू हो पाएगा।
B. नए सिरे से आम सहमति बनाना
गृह मंत्री अमित शाह ने संकेत दिया है कि सरकार महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है। संभव है कि सरकार विपक्ष की कुछ मांगों (जैसे परिसीमन को आरक्षण से अलग करना या ओबीसी कोटा पर चर्चा) को शामिल कर भविष्य में एक नया संशोधित बिल पेश करे।
C. राजनीतिक और चुनावी दांव
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार इस मुद्दे को अब 'जनता की अदालत' में ले जाएगी। बीजेपी यह नैरेटिव बना सकती है कि विपक्ष ने जानबूझकर महिलाओं के हक में बाधा डाली है, ताकि आने वाले चुनावों में महिला वोट बैंक को अपनी ओर आकर्षित किया जा सके।
फिलहाल, 2029 के लोकसभा चुनाव में 33% महिला आरक्षण लागू होने की संभावना कम हो गई है। मोदी सरकार के लिए यह एक बड़ी विधायी हार है, लेकिन "नारी शक्ति" के एजेंडे को देखते हुए यह उम्मीद की जा सकती है कि सरकार जल्द ही किसी नई कानूनी या राजनीतिक रणनीति के साथ सामने आएगी।
विपक्षी नेताओं (जैसे राहुल गांधी और प्रियंका गांधी) का तर्क है कि वे आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि सीटों के पुनर्गठन (Delimitation) के जरिए राज्यों के प्रतिनिधित्व से होने वाली छेड़छाड़ के खिलाफ हैं।
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