तालिबान का 'खौफनाक' कानून: पत्नियों को पीटने की मिली आजादी !

तालिबान के नए कानून के तहत अब अफगानिस्तान में पति अपनी पत्नी और बच्चों को शारीरिक सजा (पिटाई) दे सकेंगे, बशर्તે कोई हड्डी न टूटे। यदि हिंसा के कारण हड्डी टूटती भी है, तो महिला के लिए कोर्ट में इसे साबित करना और न्याय पाना लगभग असंभव और अपमानजनक बना दिया गया है।

तालिबान का 'खौफनाक' कानून: पत्नियों को पीटने की मिली आजादी !

अफगानिस्तान में तालिबान का नया 'क्रूर' कानून: पत्नियों और बच्चों को पीटने की मिली कानूनी इजाजत, जानें क्या हैं शर्तें

काबुल: अफगानिस्तान में सत्ता संभाल रहे तालिबान ने महिलाओं और बच्चों के अधिकारों पर एक और बड़ा प्रहार किया है। तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने एक नई 90 पन्नों की दंड संहिता (Penal Code) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह नया कानून न केवल मानवीय संवेदनाओं के खिलाफ है, बल्कि महिलाओं के खिलाफ होने वाली घरेलू हिंसा को एक तरह से कानूनी मान्यता देता है।


नया कानून: "हड्डियां न टूटें, तो पिटाई की छूट"

तालिबान की नई दंड संहिता के अनुसार, अब अफगानिस्तान में पति अपनी पत्नियों और बच्चों को शारीरिक सजा (मारपीट) दे सकते हैं। हालांकि, इसमें एक अजीबोगरीब शर्त जोड़ी गई है:

  • पिटाई के कारण हड्डियां नहीं टूटनी चाहिए

  • पिटाई से शरीर पर गंभीर चोट या स्थायी निशान नहीं आने चाहिए।

इस कानून ने उन सभी पुराने कानूनों को पूरी तरह खत्म कर दिया है जो पहले महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए थे।


इंसाफ पाना हुआ नामुमकिन: ये हैं कठोर शर्तें

यदि कोई महिला घरेलू हिंसा के खिलाफ शिकायत करना चाहती है, तो तालिबान के नए नियमों ने इसे लगभग असंभव बना दिया है:

  1. हिंसा साबित करना अनिवार्य: महिला को कोर्ट में यह साबित करना होगा कि उसके साथ हुई हिंसा कानून की सीमा (यानी गंभीर चोट) से बाहर थी।

  2. पर्दे की पाबंदी: शिकायत के दौरान महिला को पूरी तरह ढका (Burqa) रहना अनिवार्य है। वह जज को अपनी चोटें तभी दिखा सकती है जब वह पूरी तरह पर्दे में हो।

  3. पुरुष संरक्षक का साथ: कोर्ट में सुनवाई के समय महिला का पति या उसका कोई पुरुष संरक्षक (Guardian) साथ होना अनिवार्य है। यानी जिस व्यक्ति के खिलाफ शिकायत है, वही कोर्ट में उसके साथ खड़ा होगा।


नाममात्र की सजा

नया कानून कहता है कि यदि कोई पति अपनी पत्नी को इतनी बुरी तरह पीटता है कि उसकी हड्डी टूट जाए या गंभीर फ्रैक्चर हो जाए, तो भी उसे अधिकतम केवल 15 दिन की जेल की सजा हो सकती है।


मानवाधिकार संगठनों की चिंता

दुनियाभर के मानवाधिकार संगठनों ने इस कानून की कड़ी निंदा की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कानून महिलाओं को उनके घरों के भीतर कैद करने और उन्हें हिंसा के साये में जीने के लिए मजबूर करने का एक औपचारिक तरीका है।

अब इस तरह के कानून पर आपकी क्या राय है हमें कमेंट कर बताइएगा।