आखिर उस किताब में क्या था जिससे भड़क गया सुप्रीम कोर्ट ? जानिए क्यों 'करप्शन इन ज्यूडीशियरी' पर लगा बैन

न्यायपालिका की गरिमा पर सवाल उठाने वाली किताब पर सुप्रीम कोर्ट का प्रहार. 'करप्शन इन ज्यूडीशियरी' पर लगा बैन .

आखिर उस किताब में क्या था जिससे भड़क गया सुप्रीम कोर्ट ? जानिए क्यों 'करप्शन इन ज्यूडीशियरी' पर लगा बैन

सुप्रीम कोर्ट का सख्त फैसला: 'करप्शन इन ज्यूडीशियरी' किताब पर लगाया बैन, NCERT डायरेक्टर और शिक्षा सचिव को नोटिस जारी

भारतीय न्यायपालिका की गरिमा और उसकी छवि को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद कड़ा कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने 'करप्शन इन ज्यूडीशियरी' (न्यायपालिका में भ्रष्टाचार) नामक किताब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाते हुए उसकी सभी कॉपियों को बाजार और डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटाने का निर्देश दिया है। साथ ही, इस मामले में लापरवाही बरतने के लिए NCERT के डायरेक्टर और शिक्षा सचिव को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश: "डिजिटल कॉपी हटाएं, हार्ड कॉपी वापस लें"

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए स्पष्ट आदेश जारी किए हैं:

  • हार्ड कॉपी की वापसी: प्रकाशक और संबंधित विभागों को निर्देश दिया गया है कि वे बाजार में मौजूद इस किताब की सभी प्रिंटेड कॉपियों को तुरंत वापस (Recall) लें।

  • डिजिटल क्लीनअप: इंटरनेट और विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध इस किताब के पीडीएफ और अन्य डिजिटल वर्जन को हटाने का सख्त आदेश दिया गया है।

  • बैन का आधार: अदालत ने माना कि बिना किसी पुख्ता सबूत के न्यायपालिका के खिलाफ इस तरह की टिप्पणियां संस्था की साख को नुकसान पहुँचाती हैं और जनमानस में न्याय प्रणाली के प्रति अविश्वास पैदा करती हैं।

CJI की कड़ी टिप्पणी: "मंशा सही नहीं थी"

सुनवाई के दौरान CJI चंद्रचूड़ ने शिक्षा विभाग और NCERT की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि एक सरकारी संस्था के तत्वावधान में इस तरह के असत्यापित और विवादास्पद कंटेंट का प्रकाशन "अत्यधिक आघाती" है। अदालत ने टिप्पणी की कि इस किताब को स्कूली स्तर पर पहुँचाने के पीछे की मंशा साफ नहीं लगती।

NCERT डायरेक्टर और शिक्षा सचिव को नोटिस

अदालत ने इस बात पर नाराजगी जताई कि ऐसी किताब को प्रकाशित होने की अनुमति कैसे मिली?

  1. जवाबदेही तय: कोर्ट ने NCERT के निदेशक और केंद्रीय शिक्षा सचिव को व्यक्तिगत रूप से नोटिस जारी कर पूछा है कि उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों न की जाए।

  2. समीक्षा की मांग: कोर्ट ने यह भी पूछा है कि क्या किताबों के कंटेंट की समीक्षा के लिए कोई उचित तंत्र (Mechanism) मौजूद है या नहीं।


न्यायपालिका की मर्यादा सर्वोपरि

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह संदेश देता है कि जहाँ अभिव्यक्ति की आजादी (Freedom of Speech) महत्वपूर्ण है, वहीं संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा की रक्षा करना भी उतना ही अनिवार्य है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना तथ्यों के "भ्रष्टाचार" जैसे गंभीर आरोप लगाना केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था पर प्रहार है।