सबरीमाला विवाद: क्या बदलेगा इतिहास ?
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक भेदभाव से जुड़े मामले पर अब 9 जजों की संवैधानिक पीठ सुनवाई करेगी। कोर्ट ने सुनवाई की तारीख 7 अप्रैल तय कर दी है। यह फैसला देश में धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकारों की नई परिभाषा तय कर सकता है।
सबरीमाला मामला: 9 जजों की संवैधानिक पीठ गठित, 7 अप्रैल से होगी ऐतिहासिक सुनवाई
नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक प्रथाओं से जुड़े भेदभाव के बड़े संवैधानिक मुद्दों पर सुनवाई के लिए 9 जजों की पीठ का गठन कर दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि इस मामले पर विस्तृत सुनवाई 7 अप्रैल से शुरू होगी।
यह फैसला न केवल सबरीमाला मंदिर के लिए, बल्कि देश के विभिन्न धर्मों में प्रचलित उन प्रथाओं के लिए भी निर्णायक साबित होगा, जिन्हें लैंगिक आधार पर भेदभावपूर्ण माना जाता रहा है।

क्यों गठित हुई 9 जजों की पीठ?
इससे पहले 2018 में, सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की पीठ ने बहुमत से फैसला सुनाते हुए सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। हालांकि, इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं (Review Petitions) दायर की गईं।
नवंबर 2019 में, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेजते हुए कहा था कि इसमें केवल सबरीमाला ही नहीं, बल्कि मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश, पारसी महिलाओं के अधिकार और दाऊदी बोहरा समुदाय में खतना जैसी प्रथाओं से जुड़े संवैधानिक सवाल भी शामिल हैं। इन्ही "कानूनी सवालों" को हल करने के लिए अब 9 जजों की बेंच तैयार है।
सुनवाई के मुख्य बिंदु (Key Legal Questions)
अदालत इस दौरान मुख्य रूप से निम्नलिखित संवैधानिक पहलुओं पर गौर करेगी:
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धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समानता: क्या अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार के अधीन है?
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अनिवार्य धार्मिक प्रथा: क्या कोई विशेष प्रथा धर्म का "अभिन्न अंग" है, इसे तय करने का अधिकार किसे है?
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न्यायिक हस्तक्षेप: क्या अदालतें किसी धर्म की सदियों पुरानी परंपराओं और आस्था के विषयों में हस्तक्षेप कर सकती हैं?
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सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता: क्या 'नैतिकता' शब्द को केवल संवैधानिक नैतिकता तक सीमित रखा जाना चाहिए?
7 अप्रैल का दिन क्यों है महत्वपूर्ण?
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की समय-सीमा तय कर दी है। कोर्ट का उद्देश्य इन पेचीदा कानूनी सवालों का स्थायी समाधान निकालना है। 7 अप्रैल से शुरू होने वाली इस सुनवाई में देशभर के वरिष्ठ वकील विभिन्न पक्षों की ओर से अपनी दलीलें पेश करेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि: "यह फैसला भविष्य के लिए एक नजीर (Precedent) बनेगा कि व्यक्तिगत अधिकार और धार्मिक अधिकार के बीच संतुलन कहाँ बनाया जाए।"
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